बिहार बाढ़: ‘दो किलो चूड़ा पर लोग कितने दिन जिंदा रहेंगे’- ग्राउंड रिपोर्ट

बिहार बाढ़: ‘दो किलो चूड़ा पर लोग कितने दिन जिंदा रहेंगे’- ग्राउंड रिपोर्ट
पूर्वी चंपारण से
3 घंटे पहले

जगह- पूर्वी चंपारण में संग्रामपुरब्लॉक का भवानीपुर गाँव

बीते 23 जुलाई को गंडक नदी पर बने चंपारण तटबंध का एक बड़ा हिस्सा टूट जाने से इस ब्लॉक के तक़रीबन सात गाँव के सैकड़ों परिवार प्रभावित हुए हैं.

तटबंध टूटने के बाद कई दिनों तक चार-चार फुट पानी में डूबे इन गाँवों से फ़िलहाल तो आधे से ज़्यादा डूब का पानी उतर गया है. लेकिन अब चारों तरफ़ दलदल है.

कई जगहों पर अब भी एक से दो फुट तक पानी जमा होने के कारण इन गाँवों का एक बड़ा हिस्सा फ़िलहाल रहने लायक़ नहीं है.

एक ओर कच्ची झोपड़ियाँ, जहां पूरी तरह नष्ट हो गई हैं, वहीं पक्के मकानों को भी नुक़सान हुआ है. घरों के बाढ़ में डूब जाने से आज भी यहाँ के लोग चंपारण तटबंध के साबुत हिस्से पर शरणार्थियों का जीवन जीने को बेबस हैं.

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भवानीपुर: बाढ़ की विभीषिका की जीती जागती तस्वीर
स्टेट हाइवे 74 से उतर कर जैसे ही हम भवानीपुर ‘गाँव’ की तरफ़ बढ़ते हैं तो गाँव की बजाय सिर्फ़ एक डूब चुके गाँव के अवशेष नज़र आते हैं.

सबसे पहले मरे हुए जानवरों की बदबू विचलित कर देती है. ग्रामीण बताते हैं कि दरअसल, यह पानी में सड़े हुए अनाज की बदबू है. सुनकर दिल बैठ जाता है.

साथ चलते ग्रामीण एक-एक करके अपने टूट चुके घर दिखाने लगे. बाढ़ के बाद झोपड़ियां जितनी बच सकती हैं उतनी ही बची हैं लेकिन जो देर तक बची रहेगी वो बेबसी है.

अनाज रखने के लिए मिट्टी से बनाए गए पारम्परिक शैली के विशाल अनाजदानो की आधी मिट्टी बाढ़ का पानी बहा ले गया.

अब घरों के सामने सिर्फ़ नीचे से ख़ाली ढाँचे पर खड़े ठूंठ से डब्बे दिखाई पड़ते हैं. कई पक्के मकान अब भी एक फुट काई भरे पानी में डूबे हुए हैं. यह पक्के घर जिन ग्रामीणों के हैं, वह इनकी ओर उँगलियों से इशारा कर रोते हुए कहते हैं- ‘यह हमारा घर है- देखिए. अब तो सिर्फ़ पानी और साँप हैं वहाँ’.

चलते हुए पूरे वक़्त कौतूहल में डूबे गाँव के बच्चे दौड़ते रहे. इस बात से बेख़बर कि यहां उनके घरों और खेतों के डूब जाने की दारुण कथाएँ दर्ज की जा रही हैं. गाँव पार करके जब हम ऊपर चंपारण के तटबंध पर पहुँचते हैं तो विभाजन की याद दिलाने वाला दृश्य है.

उस संकरे से तटबंध पर कई किलोमीटर तक तिरपालों की झुग्गियाँ ताने लोग जीने को मजबूर हैं. जहां तक नज़र जाती है वहाँ तक सिर्फ़ काली तिरपालों की झुग्गियाँ, झुग्गियों के बीच में खड़े मवेशी, बंधी हुई साइकिलें और ज़मीन पर सूखता जानवरों का गीला चारा बिखरा पड़ा है.

नीचे डूबा हुआ गाँव, ऊपर तटबंध पर बसे लोग और तटबंध की दूसरी तरफ़ कई किलोमीटर तक फैला गंडक का पानी.

आधी रात आई बाढ़ सबकुछ बहा ले गई

भवानीपुर की पूजा अब शायद जीवन भर 23 जुलाई की वो रात नहीं भूल पाएँगी, जब गंडक का पानी आधी रात उनके घर में घुस आया था.

बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, “रात 11 बजे के बाद की बात है. हम सब सो चुके थे तब अचानक घर में किसी परिचित ने फ़ोन करके बताया कि नदी का तटबंध टूट गया है.

हम सब घबरा गए. लेकिन इससे पहले कि हम कुछ समझ पाते और यह तय कर पाते कि हमें क्या-क्या सामान लेकर कहां जाना है, तब तक तो पानी हमारे घरों में घुस आया था. तीस मिनट का समय भी नहीं दिया नदी ने. घर-बार बाढ़ के हवाले छोड़ना पड़ा. सिर्फ़ जान बची.”

तटबंध टूटने के बाद के शुरुआती तीन दिन ग्रामीणों के लिए त्रासद रहा. भवानीपुर की ममता देवी जब उन दिनों को याद करती हैं तो बेबसी और ग़ुस्सा उनके चेहरे पर उतर आते हैं.

बातचीत के दौरान उनकी आंखों में वो बाढ़ उतर आई.

काँपती आवाज़ में कहती हैं, “यह तिरपाल जो आप देख रहीं हैं, यह भी हमें तीन दिन बाद नसीब हुआ. शुरू के तीन दिन तो प्रशासन की ओर से कोई नहीं आया. नदी उफान पर थी, हमारे घर बाढ़ में डूब गए थे, ऊपर से लगातार पानी गिर रहा था और तेज़ हवा रुकने का नाम नहीं लेती.”

”हमने शुरू के कई दिन ऐसे ही एक जोड़ी कपड़ों में भीगते भीगते बिताए. बाद में सरकार के लोग एक तिरपाल, दो किलो चूड़ा, आधा किलो चना और आधा किलो चीनी दे गए थे. तब से अब तक कोई नहीं आया. दो किलो चूड़ा पर कोई कितने दिन ज़िंदा रहेगा?”

सरकारी मुआवजा छह हजार रुपए भी नहीं मिले

भवानीपुर से सटे चंपारण तटबंध पर आज भी लोग अनाज, सुरक्षित निवास से लेकर बाढ़ में हुई क्षति के मुआवज़े तक के लिए तरस रहे हैं.

इस रिपोर्ट के सिलसिले में मैंने भवानीपुर के तक़रीबन जिन साठ-सत्तर लोगों से बात की उनमें से किसी को भी बिहार सरकार द्वारा बाढ़ पीड़ितों को दिया जा रहे 6 हज़ार रुपए की क्षतिपूर्ति राशि भी नहीं मिली थी.

लेकिन प्रशासन का कहना है कि वह अपनी ओर से पूरे प्रयास कर रहा है. बीबीसी से बातचीत में पूर्वी चंपारण के कलेक्टर शीर्षत कपिल अशोक ने बताया कि ज़िले के 18 ब्लॉकों में आने वाली 160 ग्राम पंचायत और इनके अंतर्गत मौजूद कुल 370 गाँव इस साल बाढ़ से प्रभावित हैं.

इन 370 गांवों में रहने वाली तक़रीबन दस लाख की जनसंख्या बाढ़ प्रभावित बताई जा रही है.

“बाढ़ प्रभावित सभी परिवारों को छह हज़ार रुपए की सहायता राशि दी जा रही है. भवानीपुर थोड़ा पीछे पड़ता है और पिछले कई सालों से वहां बाढ़ नहीं आई थी इसलिए उनमें से कई लोगों के नाम यहां हमारे खातों के रिकॉर्ड में नहीं चढ़ाए गए थे.”

”लेकिन अब हम सभी के नाम लिखकर मुआवज़े को प्रोसेस कर रहे हैं. बैंक वेरिफ़िकेशन में भी दस दिन से ऊपर समय लग जाता है. साथ ही सरकारी नियमों और क़ायदों के हिसाब से हम फसल और मकान की क्षतिपूर्ति भी बाढ़ पीड़ितों को देंगे”.

‘चलीं, खा लीहीं’
भवानीपुर से लौटते वक़्त ललन मुखिया मुझे अपना टूटा हुआ घर दिखाने ले जाते हैं. ललन मछुआरा हैं और अपने चार भाइयों के साथ एक झोपड़ी नुमा कच्चे-पक्के घर में रहते हैं.

धूप और उमस तेज़ हो चुकी है. थोड़ी ही देर में हम उनके घर के सामने खड़े हैं. उनकी उंगली पकड़े पकड़े उनका पाँच साल का बेटा प्रिंस भी चला आया है. ललन का घर बाढ़ में लगभग नष्ट हो चुका है.

उनके घर की तफ़सील कॉपी में नोट कर जैसे ही मैं आगे बढ़ने को होती हूँ तो उनका बेटा प्रिंस कहता है -“चलीं, खा लीहीं” (चलिए, खा लीजिए). उस कठिन क्षण में अपने टूटे हुए घर के सामने खड़े इस नन्हे बालक के मुँह से एक अंजान यात्री के लिए फूटे करुणा से भरे यह शब्द मुझे अपने जीवन में हमेशा पूरब की मार्मिकता और मानवीयता को याद दिलाएंगे.

आख़िर बाढ़ की विभीषीका बिहार के लिए साल दर साल कम क्यों नहीं होती -क्यों ये चुनाव के साल में भी मुद्दा बनते नहीं दिखते. आगे की यात्रा में इस पर भी चर्चा होगी.

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